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काशी आना, वहाँ से लौटना, उसे समझ पाना — जितना सहज लगता है, उतना है नहीं।



 


काशी आना, वहाँ से लौटना, उसे समझ पाना — जितना सहज लगता है, उतना है नहीं।

इधर सोशल मिडिया पर एक पोस्ट दिखी कि काशी की मिटटी भी काशी से बाहर नहीं ले जानी चाहिए .. इसने मुझे अपनी काशी यात्रा की याद दिला दी ..
बनारस, काशी, वाराणसी विश्वनाथनगरी, महाशमशान जो भी आप कहें
किसी काम से मुझे वहां जाना पड़ा, मैं वहां के रेलवे स्टेशन से उतरा।
फिर रिक्शा ऑटो का झंझट त्यागता हुआ, पैदल ही विश्वनाथ कॉरिडोर से होता हुआ घाट की ओर बढ़ चला।
शिव की नगरी में आये है तो उसी स्टाइल में रहेंगे .. रात के करीब नौ या दस बजे रहे होंगे।
घाट पर पहुँचते ही देखा — लोग सोने की तैयारी कर रहे थे। सामने गंगा जी शांत बह रही थीं।
अंधकार में कुछ नावें किनारे पर बंधी हुई दिख रही थीं। घाट पर कुछ हलचल थी, जो धीरे-धीरे शांत होती गई — मानो खुद शहर नींद में जाने को तैयार हो।
मैं घाट-घाट आगे बढ़ता गया। चलते-चलते पहुँच गया — मणिकर्णिका घाट।
वहाँ का दृश्य देखकर मैं विचलित नहीं हुआ — बल्कि जड़ हो गया।
मैं नहीं जानता उस क्षण क्या हुआ। अब तक हर घाट की तस्वीरें खींच रहा था, पर यहाँ आकर मेरा कैमरा थम गया। आज भी नहीं जानता कि उस दिन मेरे भीतर क्या घटा।
फिर एक घाट की सीढ़ियों पर बैठ गया। देखता रहा — सोचता रहा —
“यहाँ ऐसा क्या है? क्यों आते हैं लोग यहाँ?
काशी — शिव की नगरी। सबसे प्राचीन नगर। मृत्यु की नहीं, मोक्ष की भूमि।
मैं केवल समझने का प्रयास कर रहा था — लेकिन हर प्रयास जैसे और उलझता चला गया।
न जाने कब मेरी आँख लग गई। पूरी रात मेरी वहीँ उस घाट पर बीती .. उस रात की कहाँनी फिर कभी लिखूंगा .. क्यों कुछ लेकर जाऊ सब यही छोड़ जाऊंगा , बस हिम्मत कर रहा हूँ .. कह देने की ..
सुबह चार बजे के आस पास ..
सूरज की लालिमा दिखाई दी। लाल आकाश में एक नाव छाया की तरह गंगा में चलती दिखी — लाल और काले रंग के मेल में, जैसे मृत्यु और जीवन के बीच बहती कोई आत्मा।
मैं ये तो समझ पाया कुछ है इस नगरी में पर क्या ये मुझे आज भी नहीं पता??
कुछ ऐसा ही ऋषिकेश में भी महसूस होता है
इधर मैं अब गुनगुना रहा था
मन का मैं बैरागी हूँ
विश्वनाथ का दासी हूँ
गंगा मैया जहां रहे
काशी हूँ मैं... काशी हूँ।
#काशी #यायावर #kaashi #yayavar #varanasi

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