मेरी साइकल की कहानी
कल एक पुराने स्कूली दोस्त का फोन आया — बरसों बाद। बातों का सिलसिला ऐसा चला कि
समय की नदी पीछे बहने लगी। मेरे घुमक्कड़ी जीवन की चर्चा से शुरू होकर
उसके व्यवस्थित गृहस्थ जीवन की व्याख्या तक जा पहुँची। मुझे उत्साहित करने के लिए, हँसी-ठिठोली में उसने एक बात
यूँ ही टपका दी — “भाई, मुझे तो बाइक, स्कूटी, साइकल कुछ भी चलाना नहीं आता।”
मैंने उत्साह से जवाब दिया — "अरे, ये सब तो बच्चों का खेल है! मैं सिखा दूंगा!"
फोन रखते ही, यह बात भीतर तक गूंजने लगी — क्या वाकई इतना आसान था साइकल सीखना? और मैं अपने अतीत की गलियों में लौट गया...
साइकल नहीं विज्ञान कथा का यान
जब मैंने पहली बार साइकल देखी, तो वह मुझे किसी विज्ञान कथा फिल्म के उड़न-यान जैसी लगी थी।
दो पहियों पर संतुलन बनाए रखना मेरे लिए उतना ही रहस्यमयी था,
जितना दादी के सिर पर टिके पपीते का अचानक गायब हो जाना।
दो पहिये पर कैसे चल लेती है, गाँव की गलियों में जब कोई घंटी बजाते हुए साइकल पर हवा से बातें करता निकलता,मैं उसे उसी श्रद्धा से देखता जैसे कोई साधू समाधि में लीन हो। मेरे लिए साइकल चलाना कोई साधारण कला नहीं,
ब्रह्मज्ञान प्राप्ति समान था।
डर का गियर, उम्र का क्लच
कहते हैं, इंसान दो बार गिरता है — एक बार मोहब्बत में, और एक बार साइकल सीखते समय।
साइकल चलाने की इस कला से मैं इसीलिए अनभिज्ञ रहा गया, सिर्फ एक गिरने के डर से
कमाल ये कि एक में मैं किसी भी हालत में गिरना नहीं चाहता था, उसके लिए जोर लगा रहा था
और दुसरे में गिरने के लिए एडी चोटी के जोर लगा रहा था ..
कॉलेज तक आ गया, पर साइकल का संतुलन अब भी असंतुलित ही रहा।
समय के साथ-साथ सीखने की संभावना भी कमजोर होती चली गई।
कोई बच्चा यदि गिर जाए तो लोग हँसते नहीं सहानभूति देते हैं,
न जाने कितनी चींटियो को अकारण ही कल्पनात्मक रूप से मार देते है।
लेकिन यदि कोई वयस्क व्यक्ति साइकल से गिर जाये, अरे भाई लोग पहले हँसते हैं, फिर पूछते हैं, लगी तो नहीं,
और साथ में दस ज्ञान भी पकड़ा देते हैं ..अरे भाई गिरे हैं, तो लगी ही होगी.. गिरने से कोई बिमारी तो ठीक होने से रही..
आजकल तो और बुरा हाल है,
लोग हँसते भी हैं और फिर वीडियो भी बना कर रील पर डाल देते हैं और सत्यानाश जाए उन लोगो का
बनाने वालों का भी और देखने वालों का भी .. कोई गिर गया तो तुम्हे क्या आनंद की प्राप्ति हो रही है ...
ऐसे विडिओ वायरल भी हो जाते हैं।
तो यही डर मन में घर कर गया था — कहीं लोग देख लें, गिरते हुए हँसी के पात्र बन जाएँ।
दुचक्रवाहिनी की भारतीय सूक्तियां/ नियम
भारतीय समाज में साइकल को लेकर कुछ सर्वभोमिक सत्य स्थापित हैं —
"साइकल सीखोगे तो एक बार तो गिरोगे ही।"
"पहले कैंची सीखी जाती है, फिर गद्दी।"
"साइकल आती है तो बाइक अपने आप आ जाती है, इसलिए पहले साइकल सीखो बिना साइकल के बाइक नहीं आती।"
इधर उम्र बढ़ने के साथ दो तीन लड़कों से मिला जो कहता — “मैंने तो सीधे बाइक सीख ली”, तो लगा क्यूबा की क्रांति के बाद इन्होने ही सफल क्रांति की है ।
मन एक आशा की किरण दिखाई दी कि चलो, साइकल नहीं तो डायरेक्ट बाइक भी सीखी जा सकती है।
पर बाइक कोई भुट्टे वाला ठेला थोड़े ही है, कि दस रुपये में मिल जाए। सवाल था — कौन सिखाएगा? कौन बाइक देगा? और अगर दे भी दी तो गिराने के बाद कौन सुधारेगा?
और नई बाइक खरीद कर भी कोई सीखता है क्या? और अगर गिरा और गिरना तो है ही.... साइकल का पहला नियम तो बाइक पर भी लागू होगा, और गिरे तो दिल से पहले जेब फटेगी!
यह सब सुनकर समझ आ गया कि डायरेक्ट बाइक सीखना वैसा ही है जैसे कक्षा एक के बच्चे को पीएचडी करा देना। इसलिए मन रूपी कोर्ट में आई ये अपील तो यु खारिज कर दी गई जैसे सुप्रीम कोर्ट के जज ने सम्पूर्ण देश में साइकल लेन/ ट्रेक बनाए जाने की अपील को क्षण भर में खारिज कर दिया था ..
साइकल जभी आती है जब एक बार अच्छे से गिरते हो
एक तो ये नियम जिसने भी बनाया जरुर वो वकील रहा होगा
इस नियम को तो मैं तुरंत काट देता थोडा बहुत घास फूस पर गिर कर,
पर उसने इसमें जो अनुच्छेद जोड़ दिया
कि अच्छे से गिरते हो, इसका क्या मतलब है - मतलब जब तक खून न निकल जाए.... घट्टा न खुल जाए
और फिर ...
किसी काम को करते समय अचानक चोट लग जाए तो सह लिया जाता है,
लेकिन अगर पहले से पता हो कि चोट लगनी ही है, तो!!!!
जैसे — “कमरे से बाहर निकलो और यमराज मिल जाएँ” — तो कौन निकलेगा?
बस, यही सोचकर मैं भी इस कमरे से बाहर ही नहीं निकला... और दिन, महीने, साल बीतते गए।
"सीखने की कोई उम्र नहीं होती", ये बात सब कहते हैं —
पर गिरने की उम्र होती है, और हँसी से उठने की ताकत भी, वो ताकत बचपन में प्रचुर मात्र में होती है
उम्र बढ़ने के साथ कम होती चली जाती है
ढूस, लूल और ब्रह्मास्त्र : दोस्ती
उन दिनों कंप्यूटर का ज़माना था। हर दूसरा आदमी अपने नाम के आगे "BCA, DCA" या "O LEVEL, A LEVEL" का तगमा जोड़कर खुद को सिलिकॉन वैली का रिश्तेदार समझ बैठा था। ऐसे माहौल में हमने भी, नौकरी के साथ कुछ तो सीखे, कोई तो स्किल आये .. इस मंतव्य से
अपने ही एरिया के कोने में बने एक कंप्यूटर संस्थान में दाखिला ले लिया। अब भला दूर का इंस्टिट्यूट क्यों चुनते, जब मोहल्ले वाला ही 'कट-पेस्ट' कर ज्ञान दे रहा था।
कंप्यूटर क्लास के नाम पर MP3 गानों का आदान, पिक्चरों का प्रदान और गेम्स का वितरण हो रहा था। साथ ही, दोस्ती की गाड़ी भी रफ्तार पकड़ चुकी थी — कुछ सहयात्री भी मिले, जो मेरी ही दिशा में घर जाते थे।
एक दिन, क्लास से वापसी की बेला थी। साथ में दो सहनाम ललित थे — एक थोड़ा गोल-मोल, दूसरा जैसे माचिस की तिल्ली। दोनों स्कूली मित्र थे दोनों जब साथ चलते हैं, लोग पूछते हैं—"ये बिफोर-आफ्टर फोटोशूट चल रहा है क्या?" और मैं बस उस दिन की “कैजुअल्टी”।
पुरानी जान पहचान के लड़कों की दोस्ती गोंद नहीं, चिमटी होती है — जहाँ मौका मिला, वहाँ खिंचाई शुरू। तारीफ की उम्मीद करना वैसा ही है, जैसे कटोरी में समोसा ढूँढना।
सूखे ललित ने मोटे ललित की बखिया उधेड़ते हुए उसे "ढूस" कह दिया।
नया शब्द था। मैं चौंका। मेरे लिए तो सभ्य गाली की डिक्शनरी में "बेवकूफ" ही अंतिम अध्याय था।
लेकिन सूखे ललित मेरा ज्ञानवर्धन किया: "ढूस" वह जीव है जो सामान्य जीवन के कामकाज में नालायक हो — सामाजिक, मानसिक, चाल-ढाल में 'अनफिट'।
मैंने सोचा — चलो बेवकूफ को प्रमोशन मिल गया, अब वो "ढूस" बन गया है।
लेकिन लड़ाई एकतरफा नहीं थी।
बारी अब मोटे ललित की थी — जिसे अब "ढूस ललित" कहना भाया नहीं।
उसने भी पलटवार किया और फिट ललित को "लूल" कहकर नवाज़ा।
फिर उसकी परिभाषा आई जैसे कोई गूढ़ तंत्रमंत्र सिखा रहा हो:
"कई ढूस को मिलाकर बनता है एक लूल।"
बोलिए, साहब ...क्या समर्पण है व्याकरण के प्रति! पाणिनि भी साष्टांग प्रणाम करें .. इन शब्दों पर तो ..
अब इस लेख में मैं भी दोनों के नामों को छोड़, उन्हें उनके विशेषणों से ही संबोधित कर रहा हु कुछ पंक्तियों में
— "ढूस ललित" और "लूल ललित"।
क्योंकि मैं जानता हूँ, अगर उन्हें भी मोटा या ढूस में से कोई एक चुनना हो तो वो स्वयं भी शारीरिक सत्य मोटा को छोड़ काल्पनिक शब्द ढूस चुनेगा
इधर सूखा ललित इस शब्द लूल को सुन बुरी तरह पिनपिना गया। चेहरे के भावों को सयंत रखते हुए, फिर, उसने अपने वर्षो से संजो कर रखा ब्रहमास्त्र चलाया... वो अस्त्र जिससे महाभारत का युद्ध भी फुस्स लगने लगे — "ब्रहमास्त्र!" पाशुपतास्त्र, गरूड़ास्त्र, और शक्ति अस्त्र, आग्नेयास्त्र:ये सब शांत हो जाते हैं अगर ब्रहमास्त्र कोई चला दे किसकी हिम्मत जो उसे काट दे, उसके बाद तो सामने वाले की हार निश्चित है
बोला, "ये तो इतना ढूस है कि कि कि … इसे साइकिल भी नहीं चलानी आती!"
सन्नाटा। जैसे चाय में मक्खी गिर गई हो।
लड़ाई अब भावनात्मक युद्ध बन गई थी।
ब्रह्मास्त्र यूँ ही नहीं मिलता — इसके लिए वर्षों तक तपस्या करनी पड़ती है, हितेषी दिखना पड़ता है और फिर कोई कमजोरी तलाशनी पड़ती है और फिर आता है वो मौका, जब इसका प्रयोग होता है, तब ऐसा घाव देना होता है जो दिखे न, पर चुभता रहे।
जैसे आज लूल ललित ने बड़ी ही कुशलता के साथ किया
ढूस ललित चुप हो गया। उसका आत्मविश्वास धराशायी, जैसे बिना एयर के टायर।
ब्रह्मास्त्र असर न भी करता अगर मैं वहां न होता, जान पहचान के लोगो के समक्ष उसका कोई मूल्य नहीं था
पर अनजान लोगो के बीच वो अधिक घातक था
और मैं?
मैं भी चुप था — क्योंकि उस ब्रह्मास्त्र की छाया मेरे ऊपर भी पड़ चुकी थी।
मुझे भी साइकिल नहीं आती थी।
पर उस दिन की चुप्पी, अगले दिन की कहानी का बीज बन चुकी थी।
अगला दिन – ढूस का स्क्यैर
आज कोचिंग से घर वापसी की बेला में आज ढूस ललित अकेला मिला। मैं सधी हुई चाल में उसके पास पहुँचा और वो सवाल दागा जिसे पूछने की इच्छा वर्षों से मन में बसी थी, पर शर्म की परत ने ढक रखा था:
"ललित भाई, तुम्हें साइकिल नहीं आती?"
वो मुस्कराया — ऐसी मुस्कान जो हार का स्वाद जानती हो।
आँखें मिल नहीं रही थीं, जैसे शर्म और स्वाभिमान में कोई युद्ध चल रहा हो।
मैंने देखा — वो जवाब देने से ज्यादा खुद को बचा रहा था।
वो ग्लानी से न दम तोड़ दे, इसके लिए मैंने जल्दी से बोला
"मुझे भी नहीं आती... साइकिल..."
फिर भी वो चुप था — उसे लगा शायद मैं मजाक उड़ा रहा हूँ।
मैंने दोबारा कहा:
"सच में नहीं आती। क्यों न हम दोनों मिलकर सीखें? अकेले कोशिश की पर काम नहीं बना..."
एक पल को उसकी आँखों में आश्चर्य और राहत की मिली-जुली झलक दिखी। शायद उसे वो मिला जो ढूंढ रहा था — एक साथी, एक हमसफ़र, एक "दो ढूस"।
मंथन से निकली कथा
"दिल्ली में अब साइकिल, बाइक सब बेकार की चीज़ है..."
— ये लाइन मैं तब खुद से कहता था, जब मेट्रो की भीड़ में फँसा शाहदरा से राजेंद्र प्लेस तक तीन-तीन बार ट्रेन बदलकर,
चार-चार बार झूठा आत्म-संतोष बदलकर, खुद को अपडेटेड समझने का अभिनय करता था।
असल में तो मैं दिल्ली की भीड़ में रोज़ कुचला हुआ स्वाभिमान था,
जिसे मेट्रो में यही कहकर बहलाया जाता था —
"कम से कम गर्मी में यहाँ पसीना तो नहीं आता!"
दिल्ली में साइकल बाइक सब बेकार की चीजे हैं
अब तो दिल्ली में मेट्रो हैं
न रेड लाईट पर रुकना न पेट्रोल न लाइसेंस
किसी का झंझट नहीं
दिल तसल्ली करता रहा, पर शरीर जानता था कि
सड़क की धूल भले ही न लगी हो, पर आत्मा ज़रूर खुरच गई थी।
हमारे परिवेश में रिक्शा केवल लड़कियां करती हैं
अब रिक्शा करें तो मर्दानगी पर सवाल।
ऑटो करें तो जेब पर काल।
पर ऐसे ही एक शनिवार को —
जब लड़के घर के कामों से छुट्टी पाते हैं, और बकचोदी को पूर्णकालिक धर्म बना लेते हैं —
हम घर पर आराम से बैठे थे,
कि अचानक मेरे मोहल्ले की दीवारें कंपायमान हो उठीं।
“..... भाई … भाई!”
ऐसी आवाजे सिर्फ स्कुल कॉलेज के दिनों में सुनाई देती थी,
आज ये पुरानी रसीद कहाँ से आ गई ..
वो चाहते तो घर के अन्दर आ सकते थे, परिवार जन से मिलकर तमीज के साथ
पूछ सकते थे कि फलां घर पर है या नहीं
पर नहीं
किसी मुर्गे की भाँती घर के बाहर खड़े हो बांग देना.. यही शगल होता है इनका
समझ तो मैं गया तो कोई प्राचीन मित्र है ..
मैं बाहर निकला,
और देखा — सामने ढूस ललित खड़ा था, वही जिसके साथ कभी "लूल" शब्द का व्याकरण रचा गया था।
कथा का असली तड़का अब शुरू होता है
लड़के जब एक-दूसरे के घर जाते हैं और घूमने निकलते हैं,
तो न गूगल मैप चलता है, न डेस्टिनेशन तय होता है।
बस चप्पल पहनी, जेब टटोली, और निकल पड़े —
"कहाँ जाना है?"
ये सवाल पूछना उनके अपमान की तरह होता है,
जैसे दोस्ती में लॉजिक घुसा दिया हो।
असल में, ये बिना प्लान की योजना होती है।
गंतव्य कोई नहीं , बस साथ चलने वाला बंदा सही होना चाहिए।
कभी गन्ने के जूस की दुकान मंज़िल बन जाती है,
तो कभी पार्क की बेंच पर बैठना "एडवेंचर"
कह सकते हैं—
लड़कों की दोस्ती में दिशा नहीं होती, बस गति होती है।
ऐसे ही औपचारिकताओं के बाद, हमने भी ये धर्म निभाया और पार्क की ओर निकल गए —
थोड़ी इधर-उधर की ‘पुरुषोचित’ गप्पबाज़ी के बाद,
ललित ने मर्म खोल ही दिया — "भाई, साइकिल सीखनी है..."
अब अगर मैं उस समय साइकिल चलाना सीख चुका होता,
तो शायद ज़माने भर की ठिठोली लुटा देता उस पर।
पर समस्या ये थी कि मैं खुद भी अभी तक साइकिल-साक्षर नहीं हुआ था।
हम दोनों वो प्राणी थे जिन्हें दुनिया कहती है:
"अबे 4 साल का बच्चा भी चला लेता है!"
असल में हमारी ज़िंदगी उन चुटकुलों का हिस्सा थी,
जो हँसी में नहीं, ग्लानि में खत्म होते हैं।
हमने न साइकिल सीखी थी, न बाइक, और न आत्मविश्वास का पहिया ही घुमा पाए थे।
हर बार जब कोई रिश्तेदार कहता:
"ये ले, जरा बाइक स्टार्ट करके छोटे बाजार से भोला की चाट ले आ…"
तो दिल में भूकंप आता था।
बॉडी से पसीना नहीं, रहा सहा साहस बह जाता था।
कभी कोई दोस्त कह देता ये ले बाइक की चाभी, चला ले
उसे अच्छे से पता होता है मैं नहीं चला पाता, तब सुसरा कहता भी है,
आती तो क्या देता…. असंभव
अब तो हमारा हर्दय कांपता था, कि कहीं कोई ये न कह दे
जरा बाइक को पार्क कर दे या दूसरी जगह लगा दे
या ये साइकल ले जा कुछ ले आ ..
हम तानों उलाहनों से बचती बचाती लाइफ जी रहे थे
जितना हो सके छुपाते
पर कितना छुपता ऐसी बातें छुपाये नहीं छिपती
बाइक साइकल आज बच्चे भी चलाते है
कल के पैदा हुए बच्चे पल्ल्सर लेकर घूम रहे हैं
परिणाम — दो ढूस, एक निर्णय
"सीखी जाए" — मैंने तपाक से कहा।
ना कहने का तो सवाल ही नहीं था।
असल में अब ये साइकिल नहीं थी,
ये स्वाभिमान की रील थी, जो इंस्टाग्राम पर नहीं, आत्मा पर अपलोड होनी थी।
बाइक तो बाद की बात थी —
पहले उस "बचपन में छूटी हुई ट्रेन" को पकड़ना था,
जिसका नाम था — साइकिल।
और जैसे कि तीसरा नियम था:
"जिसे साइकिल चलानी आ जाए, वो दुनिया के किसी भी दोपहिए को चला सकता है..."
इसी फार्मूला को बिना कहे ललित ने एप्लाई किया और कहा साइकल सीखनी है
बिना कहे ही मैं अर्जुन का लक्ष्य मंतव्य समझ चुका था, निशाना मछली है पर धनुष तो उठाना होगा
तो हमने तय किया —
अब ना कोई ढूस रहेगा, ना कोई लूल — बस दो सीखते हुए बंदे होंगे,
जो सड़क पर नहीं, खुद पर विश्वास करना सीखेंगे।
अब शुरू होता है एनालिसिस का दौर — यानी वो पड़ाव, जहाँ दो शिक्षित, स्नातक हो चुके युवक, बाल्यकाल को साष्टांग प्रणाम कर, जीवन की सबसे कठिन परीक्षा: साइकिल सीखने का उपक्रम करने जा रहे हैं।
पढ़ा लिखा व्यक्ति घास भी खोदेगा तो तरीके से ..
अब भला ये भी कोई ऐसी वैसी बात है कि उठे, साइकिल ली, और पैडल मार दिए!
भाइयों, ये सब तो झुग्गियों के लोंडो की तऱकीबें हैं —
जहाँ बच्चा रोते-रोते पैदल चलता है और गिरते-गिरते साइकिल सीख जाता है।
हम ठहरे लोक सेवा आयोग के अनुत्तीर्ण विद्वान,
हमने तय कर लिया —
साइकिल तो सीखेंगे, पर गिरे बिना!
(भले ही आत्म-सम्मान गिर जाए, पर शरीर सलामत रहना चाहिए।)
गिरे तो गिरे, पर गिरने की भी तैयारी होनी चाहिए
हमने सोचा, अगर गिरना ही है तो फ्रैक्चर-फ्रैक्चर खेलते क्यों मरें?
और यहीं काम आई मेरी हिंदी की पढ़ाई —
सुदर्शन जी की अमर कहानी: "साइकिल की सवारी"।
मैंने ऑफिस के कंप्यूटर पर उस कहानी की पीडीएफ़ डाउनलोड कर के,
ललित को प्रिंट निकाल कर थमा दी। ये कहानी मैंने खूब पढ़ी थी क्यों न पढता मुझे तो मेरी ही आत्मकथा लगती थी
कहानी का ज्ञान और ललित की चिंता
अब कहानी में क्या था?
एक पढ़ा-लिखा आदमी, साइकिल सीखने चला — और
न सीख सका।
कथा में लेखक हमसे बेहतर था वो कैसे, उनके अनुसार साइकल के बारे में ये विचार थे
अब आपसे क्या कहें कि लज्जा और घृणा के कैसे कैसे ख्याल हमारे मन में उठे। सोचा, क्या हमीं जमाने भर के फिसड्डी रह गए हैं! सारी दुनिया चलाती है, जरा जरा से लड़के चलाते हैं, मूर्ख और गँवार चलाते हैं, हम तो परमात्मा की कृपा से फिर भी पढ़े लिखे हैं। क्या हमीं नहीं चला सकेंगे? आखिर इसमें मुश्किल क्या है? कूदकर चढ़ गए और ताबड़तोड़ पाँव मारने लगे। और जब देखा कि कोई राह में खड़ा है तब टन टन करके घंटी बजा दी। न हटा तो क्रोधपूर्ण आँखों से उसकी तरफ देखते हुए निकल गए। बस, यही तो सारा गुर है इस लोहे की सवारी का। कुछ ही दिनों में सीख लेंगे। बस महाराज, हमने निश्चय कर लिया कि चाहे जो हो जाए, परवाह नहीं। - सुदर्शन (साइकल की सवारी)
इधर हम ये सोच कर आश्चर्य करते की आखिर दो पहियों पर ये साइकल सड़क पर गुरुत्वाकर्षण के नियमों के विरुद्ध चल कैसे पा रही है , हम हर चलते साइकल सवार को देखते सोचते अब गिरा और तब गिरा .. लेकिन वो सरपट निकलता चला जाता .. हम साइकल चलने की कार्यविधि समझना चाह रहे थे, कि किस नियम के आधार पर ये साइकल सड़क पर चलती है - पर पुराने गुनिजन ने हमें स्पष्ट किया... इसका कोई नियम नहीं है - बस चल रह रही है तो चल रही है .. इस देश की तरह ..
लेकीन साहब, अपना बैलेंस तो आज तक ज़िन्दगी में नहीं बना, तो दो पहियों पर कैसे बनता!
अब हमारा हर वीकेंड पर मिलना हो रहा था
ईश्वर की कृपा थी, सरकारी ऑफिस होने के कारण
मेरी शनिवार रविवार छुट्टी रहा करती थी
मेरे पास काफी समय था, और इन दिनों मैंने ऑफिस में भी काम करना लगभग छोड़ सा ही दिया
किसी और कार्य में मन नहीं लग रहा था
सरकारी कर्मचारयों के धर्म का मैं आजकल पूर्ण पालन कर रहा था..
व्यक्ति का ध्यान एक ही कार्य में होना चाहिए, इसका मैं हमेशा से कट्टर पक्षधर रहा हूँ
अब ललित ने जब कहानी पढ़ी,
तो न भाषा की सुंदरता देखी,
न व्यंग्य की महीन परतें,
न लेखक की मनोवैज्ञानिक गहराई —
उसने बस आख़िरी लाइन पढ़ी — और दिल पे ले ली।
बोला —
"भाई हम कहानी वाले नायक जैसे नहीं बनेंगे। हम सीखेंगे, साइकिल चलाना नहीं छोड़ेंगे!"
मैंने सोचा — हे भगवान! ये तो निष्कर्ष की ठोकर से घायल हो गया!
मैंने तो प्रेरणा के लिए कहानी दी थी,
और इसने तो क्लाइमेक्स को ही कट्टर सत्य मान लिया।
मैंने फौरन घायल उत्साह पर मरहम रखा —
"हाँ भाई, हम सीखेंगे, बिल्कुल सीखेंगे —
पर उसकी गलती से नहीं, उसकी योजना से!"
इससे उसे काफी ढाढस हुआ
मैंने उसकी आँखों में आशा की चमक दिखी और चेहरे पर संतुष्टि का भाव
उसके चेहरे पर जो मुस्कान आई,
वो वैसी ही थी जैसे सरकारी दफ्तर में
किसी बाबू को अचानक DA का एरियर मिल जाए।
कई दिन हो चुके थे उस ऐतिहासिक संकल्प को किए हुए कि —
अब तो साइकिल सीखनी ही है।
पर जैसे भारतीय किसी भी सरकारी योजना को लागू होने में समय लगता है, वैसे ही हमारे निश्चय के लागू होने
में भी विस्तृत योजना निर्माण चरण चला।
क्योंकि हम ठहरे वो लोग
जो काम करने से पहले इतना सोचते हैं कि काम खुद थककर पीछे हट जाता है।
साइकिल चलाना कोई खेल-तमाशा नहीं था —
ये "मानव बनाम गुरुत्वाकर्षण" की जंग थी।
और फिर इस युद्ध की रणनीति तैयार करने में हमने एक ही पवित्र ग्रंथ को आधार माना —
सुदर्शन जी की अमर आत्मकथा "साइकिल की सवारी"।
अब जब कोई महापुरुष पहले ही गिर-गिर कर गद्य की रचना कर चुका है,
तो हम क्यों गिरें बिना दिशा-निर्देश के?
पुरानी जींस और फूटकल बैंडएड: नई पीढ़ी की ढाल
कहानी में लेखक ने फटे पुराने कपड़े पहने ताकि गिरें तो "धन हानि" सीमित रहे।
हमने इस नीति को अपग्रेड कर दिया —
पुरानी जींस पहनी।
विचार था —
गिरने पर चोट भी कम लगेगी, और फट गई तो फैशन कहलाएगा।
(हमारा दर्द भी ट्रेंड में रहे)
उधर लेखक ने गिरने पर मरहम पट्टी का उल्लेख किया, वो तो हम समझ ही नहीं पाए क्या था जम्बक शम्बक
तो हमने आधुनिक पट्टिकाए माने दस पंद्रह बैंड-एड रख ली —
न आलोचक, न लूल ललित
साइकल की सवारी कहानी के लेखक की मुख्य आलोचक थी उनकी पत्नी —
हम इस मामले में सौभाग्यशाली थे।
लूल ललित होता तो इस भूमिका में रम जाता,
पर वो खुद इस महायज्ञ में आहुति देने आया था।
कबीरदास भले "निंदक नियरे राखिए" कह गए हों,
पर वो शक्ति नहीं दे गए जिससे हम निंदक को नियर रख सके, ये अंग्रेजी वाला नियर कबीर दास जी से ही आया है
क्या खैर .. भाषा उत्पत्ति पर न जाते हुए हमने कहा —
"निंदक नियरे क्या, घर में भी न घुसने पाए!"
मिशन इतना गोपनीय था कि अगर NIA ने पूछ लिया तो हम यही कहते — "हमें खुद नहीं पता"।
साइकिल की खोज: शोध और संकोच का संगम
अब समस्या साइकिल की थी।
लेखक तो कहीं से उधार ले आए —
उनके सामाजिक संपर्क हमें संदेहास्पद लगे।
हमारे लिए तो उधार माँगना
स्वाभिमान और शर्मिंदगी के बीच रस्साकशी थी।
और इस रस्सी का फंदा हमेशा हमारी ही गर्दन पर लगता।
हमने मान लिया —
आजकल बिना पैसे कुछ नहीं मिलता।
"मुफ्त की चीज़ अब या तो चुनाव में मिलती है या ईश्वर की कृपा से।"
(पूँजीवाद की माया है बाबू!)
मिस्त्री से पूछने की ज़रूरत नहीं पड़ी,
हम पहले ही तय कर चुके थे —
"वो देगा नहीं।"
(भविष्यवाणी नहीं, पूर्व-आत्मसमर्पण था।)
नई नहीं, पुरानी साइकिल — एक साझी विफलता की योजना
नई साइकिल का विचार एक झटके में नकार दिया —
हम इतने भी आत्मविश्वासी नहीं थे कि गिरने का "पहला निशान" शोरूम की नई साइकल से शुरू करें।
मित्र बोला —
"पहले एक ही साइकिल लेते हैं।"
मैंने तुरंत उसके मन का अविश्वास सूंघ लिया।
वो शायद अब भी यही मान बैठा था कि
हम नहीं सीख पाएंगे।
सच यही था —
और शायद हम दोनों को इसका एहसास था,
पर प्लास्टिक के आत्मविश्वास की कोटिंग अब तक चढ़ चुकी थी।
दुकान और दुकानदार: डर का नया आयाम
अब प्रश्न था —
साइकिल खरीदी कहाँ से जाए?
क्योंकि हम जैसे नौसिखियों को देख कर
दुकानदार अगर हाथ में साइकिल पकड़ा कर बोल दे —
"लो चलाओ" —
तो हमारी आत्मा ही चेन कवर में फँसकर चरमराने लगेगी।
या बोल दे — "चलाओ पहले, फिर भाव-ताव करें!"
अब ऐसे में कोई बालिग बालक कैसे कहे — "भाई साहब, हमें तो चलानी भी नहीं आती।"
किसी भी कार्य में सबसे बड़ा डर वो नहीं होता कि असफल हो जाएं,
बल्कि यह होता है कि लोग देख लें कि आप असफल हुए।
अंतिम विचार
तो साहब,
ये थी हमारी "साइकिल पूर्व योजना",
जहाँ दो पढ़े-लिखे नौजवान
गिरने की तैयारी में ही उम्र गुजार रहे थे।
हमने तब जाना —
साइकिल सीखने से ज्यादा कठिन है,
साइकिल लेना।
और अगर हम फिर कभी न सीख पाए,
तो इतना ज़रूर कहेंगे —
"हमने योजनाबद्ध नाकामी में एक नई मिसाल गढ़ दी।"
प्रमोद साइकल वाले की दुकान : लोकल NASA लैब
साइकिल की तलाश हमें ले गई प्रमोद साइकल वाले की दुकान,
जिसे मैं ऑफिस आते जाते ऐसे ताकता था जैसे
जैसे किसान अपनी फसल को ताकता है —
शराबी शराब के ठेके को,
लड़के लड़कियों के स्कूल-कॉलेज के गेट और खिड़कीयो को,
और साइकल सीखने की इच्छा रखने वाला व्यक्ति साइकल के शोरूम को।
आनंद की बात ये है कि शराब का ठेका खुला भी न हो, तो भी शराबी की नजर उस ओर जाती है;
स्कूल-कॉलेज में अवकाश हो तो भी लौंडे लपाड़ों की नजर एक बार उधर जायेगी ही.;
और अगर ठेका या कॉलेज खुला मिल जाए — तो भले ही भीतर से कोई प्रोडक्ट या प्राणी न दिखे,
प्रेछ्क के चेहरे पर एक संतोष का भाव आ ही जाता है।
यह बात हर उस व्यक्ति पर लागू होती है जो किसी चीज़ का शौक़ीन हो —
या फिर जो दिल से किसी चीज़ को प्रेम करता हो।"**
(किसान वाली पहली पंक्ति मुंशी प्रेमचंद की अमर दृष्टि का उदाहरण है, बाकी सब मेरे जीवन में वर्षों की घोर कठिन रिसर्च का निष्कर्ष है।)
वो साइकल दुकान नहीं थी, भावनाओं की पराकाष्ठा थी।
उस दिन हम पहुँचे, तो देखा प्रमोद जी किसी पुराने साइकल के पहिये में न जाने कौन सा रोकेटी यन्त्र फिट कर रहा था, जैसे NASA का कोई मिशन लॉन्च होने वाला हो।
हमने हिम्मत जुटाई और धीरे से पूछा —
"साइकिल मिलेगी... सेकंड हैंड?"
जवाब आया —
"मिल जाएगी, किसके लिए चाहिए?"
अब इस "किसके लिए" ने आत्मा को लताड़ दिया।
लगता है बेज्जती का पिटारा खोल ही लिया है।
ये तो आते ही बेज्जती होने लगी - आगे क्या होगा
बाद का वाक्य अनसुना करने की असफल सी एक्टिंग करते हुए हमने कहा
दिखाओ फिर …
खैर, गली में बंधी हुई कुछ साइकिलें दिखाई गईं, जो दिखने में ऐसी थीं जैसे 'भारतीय रेलवे की सीटें – घिसी पड़ी थी, पर देख कर मन डोल जाए'
छोटी बड़ी, खूब स्क्रेच लगी हुई, कहीं के तार कही से निकले हुए
पर उसे कोई साइकल कहने से मना नहीं कर सकता था
साइकल वाले सभी कर्तव्य वो पूरे करने में समर्थ थी
हमने साझा सम्मति से एक मध्यम कद की साइकिल चुनी,
प्राइस: अठारह सौ
रूपये का नाम आते ही, हमें अशोक कुमार (कर्नल जुलियस नागेन्द्र विलप्रित सिंह) और अमोल पालेकर (अरुण प्रदीप) के बीच का वो सीन याद आ गया जिसमे वो रुपयों को कर्नल को बड़े जोश के साथ देता है - अक्सर हम दोनों स्वयं की अमोल पालेकर से तुलना करते और प्रतीक्षा किसी कर्नल के अपने जीवन में आने की —
दोनों ही अब जॉब करते थे,तो पैसो की कोई दिक्कत थी नहीं, दिक्कत थी सम्मान की … आत्मसम्मान उसे कैसे पाया जाए .. —-
इसलिए अब अगर जिन्दगी को एक जबरदस्त घुमाव देना था, किसी भी चीज से नहीं डरना
हमने भी वो साइकल की पेमेंट तुरंत जेब से निकाल कर दे दी, और साइकल को हाथो से पकड़ कर ले चले
मेरे बड़े भाई के कोचिंग इंस्टीट्यूट पर, जहाँ एक कमरा ऐसे ही गोदाम टाइप का बना हुआ था उसमे वो साइकल ले जा कर खड़ी कर दी गई, यही कोचिंग इंस्टीट्यूट हमारी साहसिक गतिविधियों का केंद्र बना ..
सीखने की शुरुआत : गिरते-पड़ते दो वीर
अब हमारी शपथ थी — हर शनिवार-इतवार साइकिल सीखेंगे
उस मैदान में, जहाँ न कोई जानने वाला हो न पहचानने वाला।
कोचिंग के गोदाम से साइकिल निकालना,
सड़कों के आवारा कुत्तों से बचते हुए निकलना,
और फिर उस मैदान में गौरवपूर्ण असफलता प्राप्त करना।
हम लोगो ने जगह के चुनाव के लिए काफी सोच विचार किआ था , निश्चित था अपने एरिया में तो
ये कार्य किया नहीं जा सकता , काफी मंत्रणा के बाद दो चार जगह मैंने सुझाई
अभी, आज मैं ये स्वीकार कर सकता हूँ कि मुझे साइकल नहीं आती थी , लेकिन मैंने क्या क्या जगह चुनी इसे आपको बताने की हिम्मत मैं आज भी नहीं कर पा रहा हूँ ..शर्म से ..
कभी हिम्मत जुटा पाया तो अवश्य बताऊंगा ..
साइकिल ले कर हम अपने निर्धारित 'रणक्षेत्र' पर पहुंचे।
पहले दिन लगे जैसे साइकिल हमसे कह रही हो —
"बेटा तू संभाल खुद को, मुझे क्या चलाएगा?"
हैंडल कांपता, घुटनों से ज़्यादा आत्मा काँपती,
कभी हैंडल पकड़कर चलते, कभी गद्दी पर बैठकर पैडल पर पैर रखने की कोशिश करते।
पर जैसे ही पैर पैडल पर टिकता, हैंडल कंपकंपाने लगता ,
गति कम, सतर्कता अधिक थी। लक्ष्य साइकिल चलाना नहीं था — गिरने से बचना था।
यह उपक्रम — कभी मैं, कभी वो — ऐसे चलता रहा जैसे सरकारी दफ्तर में एक फाइल एक टेबल से दूसरी टेबल तक
घूमती है।
दोपहर तक दोनों थक चुके थे। शरीर से भी, मन से भी।
सोचा — "आज के लिए इतना अनुभव काफी है, अब जलजीरा पिया जाए और कल फिर से किस्मत आजमाई जायेगी हैं।"
🚴♂️ अगला दिन, वही असफलता
सुबह-सुबह फिर वही कार्यक्रम।
कोचिंग पहुंचे, ताला खोला, साइकिल निकाली... और फिर वही जंग — "चलेगी कि नहीं?"
पर अफसोस, साइकिल आज भी नहीं चली।
थक-हारकर वापस घर आ गए। अब निराशा मन में अपनी गद्दी जमाने लगी थी।
एक सवाल दिल में घर करने लगा —
"क्या हम कभी साइकिल चला भी पाएंगे?"
"कहीं हम हमेशा के लिए अमोल पालेकर (पात्र अरुण प्रदीप फिल्म छोटी सी बात ) ही तो नहीं रह जाएंगे?"
(कहाँ उनसे तुलना कर रहा हूँ — अमोल पालेकर फिर भी महान थे, उन्हें तो बाइक चलानी आती थी... हम तो उनसे भी गए-गुजरे निकले!)
गिरने का भय और आइडिया
दिन बीतते गए। हम एक-दूसरे का हौसला बढ़ाते रहे, एक दुसरे का मज़ाक नहीं उड़ाया — क्योंकि हमें पता था कि जिस दिन हंसी छूटी, उस दिन मिशन अधूरा रह जाएगा।
आख़िरकार, मैंने एक गहन और मौलिक निष्कर्ष निकाला —
हम गिरने के डर से नहीं सीख पा रहे हैं।
तो क्यों न कोई ऐसी साइकिल ली जाए जिसमें गिरने का डर ही न हो?
मतलब?
बच्चों वाली साइकिल!
इतनी छोटी कि पैर ज़मीन पर पूरे टिक जाएं गिरने की कोई सम्भावना ही न रहे।
इतनी सीधी-सादी कि कि कोई इंसल्ट वैल्यू ही न बचे।
मित्र इस सुझाव का घोर विरोधी था —
शायद उसे डर था कि भविष्य और वर्तमान हमें “LKG बैच साइकलर” के रूप में याद रखेगा।
लेकिन मैं अब पीछे हटने वालों में से नहीं था।
आत्मसम्मान की बलि देकर भी, सीखने की अग्नि परीक्षा देनी ही थी।
मैं फिर से प्रमोद साइकिल वाले के पास गया और एक नंबर छोटी साइकिल लेकर कोचिंग में खड़ी कर दी।
अब देखना था — ये "बाल संस्करण" हमारी किस्मत बदलता है या नहीं।
इधर साइकल वाला समझ चुका था लड़के अपने सीखने के लिए साइकल ले रहे हैं
पर उसने चुप्पी लगाईं और हमारी इज्जत को नीलाम होने से बचाया ..
अब अगला वीकेंड जैसे कोई महायुद्ध की तारीख हो — उसका इंतज़ार शुरू हो गया।
पूरे हफ्ते सपनों में बस साइकिल ही आती रही।
(अब रात को आराम की नींद कहाँ? बार बार चौंकते थे और देखते थे कि कहीं सूरज तो नहीं निकल आया। सोते थे तो साइकिल के सपने आते थे। एक बार देखा कि हम साइकिल से गिरकर जख्मी हो गए हैं। साइकिल आप से आप हवा में चल रही है और लोग हमारी तरफ आँखें फाड़-फाड़ के देख रहे थे। साइकल की सवारी - लेखक सुदर्शन की कहानी से)
रणक्षेत्र की वापसी
आख़िर वो सुबह आई — वीकेंड की, भाग्य बदलने वाली!
कोचिंग से निकलते समय अब हमारे पास अपनी-अपनी साइकिलें थीं।
एक लंबा रास्ता तय कर हम फिर उसी पुराने रणक्षेत्र पर पहुंचे।
उधर ढूस ललित ने जब मेरी छोटी साइकल देखी तो मुस्कुराना चाहा — पर वो मुस्कान अंदर ही समेट ली,
जैसे कोई अनकहा एग्रीमेंट हो।
और इधर मैं — उस साइकिल पर बिल्कुल पांचवी-छठी कक्षा के बच्चे की तरह बैठा हुआ,
पर अब शर्म वर्म सब छोड़ चुका था।
मामला अब सिर्फ साइकिल चलाने का नहीं, आत्म-सम्मान का था।
अन्तत: चमत्कार घटित हुआ
मैंने साइकिल को थोड़ा ठेला, फिर ज़मीन पर पैर जमा दिए।
ये प्रक्रिया चार-पाँच बार दोहराई...
और फिर — चमत्कार!
इस बार मैंने चलते-चलते पैडल पर पैर रख दिए।
ना साइकिल डगमगाई, ना हैंडल काँपा।
मैंने पैडल मारे और करीब 200 मीटर तक साइकिल चला दी — बिना गिरे!
अविश्वास के भाव में, दिल धड़कता रहा।
पर मैं रुका नहीं।
फिर कोशिश की — और इस बार पूरे मैदान का एक चक्कर काट आया!
मैंने मित्र ललित की ओर देखा और ज़ोर से चिल्लाया —
"आ गई! आ गई!"
वो भी मुस्कुरा कर बोला —
"हाँ! तुम्हें तो आ ही गई भाई!"
पर उसके चेहरे पर ईर्ष्या, जलन और हल्का-सा दुःख — साफ़ नज़र आ रहा था।
क्योंकि अब मैं 'छोटी साइकिल' पर ही सही, लेकिन चलाने वालों की श्रेणी में आ चुका था।
कुछ वैसा ही जैसा ३ इडियट मूवी में कहा गया - दोस्त का फेल होना दुःखद होता है, लेकिन अगर वही फर्स्ट आ जाए तो और ज़्यादा दुःख होता है
"पहियों की पराक्रमा"
बचपन से ही जीवन की रेस शुरू हो जाती है — पहले माँ की गोद में दूध की दौड़, फिर स्कूल की रैंकिंग, उसके बाद IIT-NEET-UPSC की सीढ़ियाँ, और अंत में शादी-ब्याह की टेंशन। हर मोड़ पर अदृश्य ट्रॉफी टंगी है, जिसे पाने को हर शख्स ‘दिन-दूना रात चौगुना’ मेहनत करता है।
ऐसे ही अगले दिन ललित ने ऐलान कर दिया — “आज मैं भी छोटी साइकल चलाऊँगा!”
मैंने मन मारकर उसे अपनी छोटी साइकल दे दी और उसकी बड़ी साइकल पर चढ़ गया।
ईश्वर भी शायद आज फुर्सत में था, मैं वो बड़ी साइकल भी चला गया, और प्रतियोगिता में घायल न सही,
बराबर का खिलाड़ी बन गया।
उधर दूसरी तरफ — ललित ने भी जोश में आकर छोटी साइकल खुद चला ली। और थोड़ी देर बाद मध्यम उंचाई वाली भी, अब हम दोनों विजयी योद्धा की तरह घर लौटे,
इधर तेज लू चल रही थी उधर हम दोनों
कुछ समय बाद ..
अब मैंने ढूस ललित से भी पूछा स्कूटी सीखे, पर अब वो व्यस्त हो चूका था नौकरी घर परिवार में ..
समय बीतता गया, मैं साइकल से स्कूटी, स्कूटी से पल्सर, पल्सर से एवेंजर, और फिर कार तक।
हालाँकि कार मुझे हमेशा ऐसी लगी जैसे ‘बैलगाड़ी में AC ठूंस दिया हो’, कार बेकार, दौ सौ मीटर चलो
तो रेड लाईट मुहं फाड़े खड़ी रहती है, फिर आते हैं यु-टर्न, इतने लम्बे कि लगता है इंडिया गेट से गुरुग्राम घूम के वापस
आना है। पेट्रोल जल रहा है, ब्रेक पैर से नहीं, आत्मा से लग रहे हैं। पीछे हॉर्न बजाता ऑटो,
आगे मोबाइल में व्यस्त कार वाला इसलिए अपना दिल बाइक और साइकल में ही अटका रहा।
इस बीच दिल्ली से ऋषिकेश तक पहियों की धूल उड़ाते रहे।
कभी टायर्स घूमते, कभी किस्मत। ज़िंदगी साइकल के पहियों पर सवार हो गई थी।
इधर कल शनिवार का दिन था, घर के बाहर से आवाज आ रही थी मेरे नाम को कोई जोर जोर से पुकार रहा था
समझ गया ये ,कोई स्कुल या कॉलेज का मित्र है
निकला तो देखा — क्रोकस पहने हुए ढूस ललित बाहर खड़ा था
वह अचानक गंभीरता ओढ़कर बोला —
“भाई, स्कूटी सीखनी है...”



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