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बीते सप्ताह में दूसरी बार विश्व पुस्तक मेले पहुँच गया। 2026



 बीते सप्ताह में दूसरी बार विश्व पुस्तक मेले पहुँच गया।


असल में घर पर बैठा था, और आजकल जब आदमी के पास कोई ठोस काम न हो तो वह या रील स्क्रोल करता है या फिर घुमने निकल जाता है। मैंने दूसरा रास्ता चुना।


अब दिल्ली में रहते हैं तो प्रदूषण, ट्रैफिक और भीड़भाड़ तो जीवन का स्थायी भाव हो चुके हैं। जब ये सब रोज़ झेल ही रहे हैं, तो सोचा दिल्ली के फायदे भी उठाए जाएँ। जहर में भी दवा और नशा है मित्र, सही मात्रा में लो और झूमों और घूमों ...और यहाँ रोज़ किसी न किसी मैदान में कुछ न कुछ हो ही रहा होता है, कहीं पुस्तक मेला, कहीं कोई आंदोलन, कहीं संगीत की महफ़िल...यही तो दिल्ली हैं

तो निकल पड़ा पैदल पैदल। घर से चार–पाँच किलोमीटर की वॉक करते हुए शाहदरा बस टर्मिनल पहुँचा।और वहाँ जाकर 623 नंबर की बस में बैठ गया।

बोलने वाले कह सकते हैं कि बस तो घर के पास से ही मिल जाती है, पर फिर ये वॉक कैसे होती? और बिना वॉक के मुझे आत्मसंतोष कहाँ मिलता है?


ऊपर से टर्मिनल से बसें आराम से खाली मिलती हैं, इसलिए यहाँ आया। बहुत समय बाद बस में बैठना हुआ। बस के अंदर हर तरफ, हर शीशे पर “Scan Here” और ऑनलाइन टिकट पर 10% डिस्काउंट चिपका था। डिजिटल इंडिया पूरे आत्मविश्वास के साथ बस में सवार था।


मैंने भी सोचा, चलो, समय के साथ चला जाए। बैठे-बैठे one ऐप डाउनलोड किया, डिटेल्स डाल कर टिकट बनाया। शाहदरा से ITO, AC बस के बीस की जगह अठारह रुपये लगे। ऊपर से अमेज़न ने दो रुपये का कैशबैक भी दे दिया।

अब भले ही जीवन में कभी लॉटरी न लगी हो, पर दो रुपये  दो रूपये के कैश बैक पर आत्मसंतुष्टि प्राप्त होती है।

अब जाया जाएगा AC बस में बैठकर, विश्व पुस्तक मेले।

जहाँ किताबें हों, ढेर किताबे


पिछले दो महीनों से मेरे पोस्टर, पोस्ट और मेरी इन्स्टा फेसबुक की स्टोरी चिल्ला-चिल्लाकर बता रही थीं कि दिल्ली में विश्व पुस्तक मेला लगने वाला है, वो भी फ्री एंट्री के साथ। अब भाई, जिसे जाना है जाए, बाकी लोग घर बैठकर रील देख लें, आजकल वह भी एक तरह का साहित्य ही है।

इस बार मेले में पिछले साल से ज़्यादा भीड़ थी।

घूमते-घूमते एक स्टॉल पर अचानक हिंदी के विश्व-प्रसिद्ध हास्य कवि और कलाकार सुरेन्द्र शर्मा, अरुण जैमिनी और चिराग जैन तीनों एक साथ घूमते दिख गए। ये वे लोग हैं जिन्हें हम नेशनल टीवी पर देखते सुनते हुए बड़े हुए हैं..मैंने भी झट से एक-एक कर सबके साथ फोटो खिंचवा ली अरे ऐसा मौका फिर कहाँ मिलेगा…


कुछ समय पश्चात ही वहाँ लेखक नीलोत्पल मृणाल जी भी आ पहुँचे वही जिनकी किताबें औघड़, डार्क हॉर्स, यार जादूगर आजकल युवाओं के बैग और इंस्टा कैप्शन दोनों में बराबर मिल जाती हैं।


एक मजेदार किस्सा हुआ, एक पाठक अपने झोले में से किताब निकालता है, नीलोत्पल मृणाल से उनके हस्ताक्षर उन्ही की पुस्तक पर मांगता है, लेखक पुस्तक हाथ में लेते हैं अलटते पलटते हैं और कहते हैं "अरे यार पायरेटेड पुस्तक लेकर आते हो और ऊपर से उस पर साइन भी करवा रहे हो , क्या कर रहे हो भाई? लेखक तो फ्रस्टिया जाएगा ये देख के, विश्व पुस्तक मेले में नकली किताब और असली लेखक से सिग्नेचर, इधर से एक आवाज आई ये पाठक चाहते हैं लेखक प्रेमचंद का जीवन जिए - मतलब प्रसिद्ध भले विश्व भर में हो पर मरे ग़रीबी में ...

वैसे पाठक उन्हें प्यार से “बाबा” कहते हैं, उनके साथ भी कुछ फोटो और वीडियो बनाए मैंने जो मैंने अपनी वाल पर डाल दिए हैं..

इन सब के बाद तब जाकर महसूस हुआ, चलो, आज का दिन बेकार नहीं गया।

किताबें भले कम खरीदीं, लोग को ज्यादा पढ़ा।

और दिल्ली में रहते हुए, शायद यही सबसे बड़ा साहित्य है।

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