"रूदादे सफर" पंकज सुबिर द्वारा लिखा गया उपन्यास...जब इस उपन्यास का नाम देखा तो गूगल बाबा से पूछा कि इसका मतलब क्या है , कई अर्थ थे लेकिन उपन्यास खत्म करने के बाद यदि मैं उन अर्थों की पोटली से कुछ निकलूं तो वो होगा " सफर की कहानी" एक ऐसा सफर जिसमे नई नई जगह की नही बल्कि नए नए मनोभाव की यात्रा है....बहरहाल
इस उपन्यास में पात्र बेहद कम है लेकिन जितने भी है वो उत्साह और रोचकता से भरे हुए है या यूँ समझिए कि कहानी कि जरूरत है....कहानी है एक काबिल डॉक्टर की जिसके अकेलेपन को लेखक ने गीतों और गज़लों के सहारे ऐसा बांधा है कि बोरियत की गुंजाइश नही है.....ये उपन्यास पिता और बेटी के रिश्ते के ऊपर आधारित है कहानी इसी रिश्ते को केंद्र में रखकर लिखी गयी है...एक डॉक्टर बाप-बेटी जो एक दूसरे के साथ ,एक दूसरे के लिए जिंदगी बिताना चाहते है मगर मिलना बिछड़ना तो ज़िंदगी है, इसी मिलन- बिछड़न को पिरो के कहानी गुथी गई है...
इस कहानी के बीच मे नायिका कहती है कि " बेटी अपने पति में पिता के गुणों का प्रतिबिंब तलाशती है" इस कथन का वास्तविकता से कितना सरोकार है इसका मुझे अंदाज़ा नही लेकिन ये कथन इतना बताने को काफी है कि पिता-पुत्री के सम्बंध कितने निर्मल और कोमल होते है,
पिता-पुत्री के एक दूसरे के प्रति स्नेह को दर्शाने के लिए काफी है...पिता पुत्री के रिश्ते को आगे बढ़ाते-बढ़ाते कहानी में आए उस पहलू को देखकर पाठक हैरानी में पड़ जाते हैं जब डॉक्टर पति को जीवनभर खरी-खरी सुनाने वाली , उनके विचारों के विपरीत चलने वाली उनकी पत्नी आखिरी दिनों में अपनी बेटी के सामने यह राज खोलती है कि वो क्यों उसके पिता को ऐसा बोल कर क्या कराना चाहती थी?
इस उपन्यास में जो सवांद है वो बड़े प्यारे है कुछ कुछ सवांद तो ऐसे है जो आपके मनोभावों को कटघरे में खड़ा कर दे....और कुछ तो ऐसे जैसे मानो ये आपकी ही बात को चुपके से पन्नो पे उकेर दिया गया है.....
मां के गुस्सैल स्वभाव के बावजूद पिता बेटी की नजरों में मां की छवि गरिमामय बनाते हैं। वह बेटी को बताते हैं, "हम वही बनते हैं, जो हमें हमारी जिंदगी शुरू के बीस-पच्चीस वर्षों में बनाती है, हमारा स्वभाव, हमारी आदतें, हमारी पसंद-नापसंद, सब हमारे जीवन के शुरू के पच्चीस सालों में तय हो जाता है। तुम्हारी मम्मी वही है जो उनको जिंदगी ने बना दिया है"
एक जगह लेखक लिखते है कि "स्त्रियां आदिकाल से प्रवासिनी हैं और शायद अनंत काल तक इनको प्रवासिनी ही रहना है" और फिर वो लिखते हैं "पुरुष ने सभ्यता बनायी है, पुरुष ने ही समाज बनाया है, इसलिए प्रवास और विस्थापन उसने स्त्री के पक्ष में रख दिया"
अपने प्रियजनों के पास रहकर भी हम उम्र भर वो बात नहीं कह पाते जो हमें रोज़ कहनी चाहिए, ऐसे ही एक पल में लेखक लिखते है कि "बहुत पास बैठा हुआ कोई अपना जब उठ कर जाने वाला होता है, तब सबसे ज़्यादा छटपटाहट इस बात की होती है कि हमारे पास उसे रोकने का कोई तरीक़ा शेष नहीं रहा"
इस उपन्यास में लेखक ने देहदान की उपयोगिता, उसके महत्व तथा उसकी सामाजिक और नैतिक जिम्मेदारी को जिस बखूबी से चित्रित किया है, वह काबिले तारीफ है...
अंतः मैं ये बिल्कुल नहीं कहूंगा कि ये ऐसा उपन्यास है जो आपके हाथ मे जादू की छड़ी दे देगा ये कहते हुए की इस छड़ी को घुमाओ और अपना नया व्यक्तित्व पाओ...लेकिन इतना जरूर कहूँगा कुछ बिंदुओं पे आपके विचारों को पैना और नुकीला जरूर बनाएगा....ये उपन्यास वैसा नहीं है जिसे सहेजने के लिए एक विशेष अलमारी की जरूरत हो लेकिन एक बार पढा जाना चाहिए इतना विशेष तो अवश्य है...
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